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सोमवार, 9 जुलाई 2012

गुफ्तगू के ‘लोगो' का विमोचन व मुशायरा संपन्न

शनिवार की शाम इलाहाबाद के करैली मुहल्ले में स्थित 'अदब घर' में गुफ़्तगू के 'लोगो' का विमोचन अमृत प्रभात के कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र ने किया। इस दौरान नशिस्त का आयोजन किया गया| जिसमें कवियों-शायरों ने अपनी रचनाएं सुनाईं। रात ११ बजे तक लोगों ने शेरो-शायरी का आनंद लिया। अध्यक्षता वरिष्ठ शायर डा. इनआम हनफी ने किया| तथा संचालन का दायित्व इम्तियाज अहमद गाजी ने पूरा किया।



मुनेश्वर मिश्र ने इस अवसर पर गुफ़्तगू के साथ गुजरे समय को याद करते हुए कहा कि अनवरत प्रयास में लगे रहने पर देर-सवेर सफलता जरूरत मिलती है| यह बात गुफ्तगू टीम पर भी लागू हुई और आज परिणाम सबके सामने है। एक छोटे से प्रयास से शुरू हुई की गई इस पत्रिका में देश-विदेश में अपनी पहचान बना ली है, और यह अपने प्रकाशन के दस वर्ष पूरे करने जा रही है और आज इसका 'लोगो' तैयार कर उसका विमोचन कर दिया गया यह एक और कदम आगे बढ़ने की ओर संकेत दे रहा है। 


सलाह ग़ाज़ीपुरी-
बढ़ा नेफ़ाक़ जो सहने-चमन की वादी में,
खेज़ा के दौर में ख़ारों ने साथ छोड़ दिया।
मुझे तो गहरी नदी में ही डूब जाना था
क़रीब आकर किनारों ने साथ छोड़ दिया।


नरेश कुमार महरानी
हे प्रिये मिलो मिलने की चाह लिए
जहां जमीं आसमां मिलते हैं।

 विपिन श्रीवास्तव- 
तुम सुग्मित सतरंगी सी दामिनी आई
दंतावलि में जब आंचल कोर दबाती आई।
ओ तन्वगी तेरे तन आई तरूणाई
अंग-अंग आंखें खोले जब तू ले अंगड़ाई।



गुलरेज़ इलाहाबादी-
कोई कांधे पे लेकर चल रहा मां-बाप को अपने
कोई बोझा समझता है तो नेकी छूट जाती है।
रहे फूलों की संगत में तो कांटे भी महकते हैं
मरा से राम बनते ही डकैती छूट जाती है।


फरमूद इलाहाबादी-
पी के दारु अंग्रेजी चूहा झाड़ने लगा।
शेरे बब्बर की तर्ज पर दहाड़ने लगा।
जा के बिल्ली के पास बोला आई लव यू
बिल्लो रानी कहो तो अभी जान दे दूं


 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
राह में पहले कांटे बिछा दो।
मील का हमको पत्थर दिखा दो।
कोई भी जंग मुश्किल न होगी
शर्त है खुद को ग़ाज़ी बना दो।


शाहिद इलाहाबादी-
बहुत लतीफ है एहसास पारसाई भी
न हो जो पास तो होती है जग हंसाई भी।
मसीहे वक़्त को ज़र की तलब ने लूट लिया
मलो अब हाथ गई दस्त से शिफाई भी।


वीनस केसरी-
जाल सैयाद फिर से बिछाने लगे।
क्या परिन्दे यहां आने-जाने लगे।
वो जो इस अड़े थे कि सच ही कहो
मैंने सच कह दिया तिलमिलाने लगे।


डाॅ. सूर्या बाली-
शहर ये हो गया श्मशान कहीं और चलें।
बस्तियां हो गयीं वीरान कहीं और चलें।
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई इसाई यहां
है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें।


फरहान बनारसी-
रहबरी जब हो किसी मद-ए-खुदा की, तो ये मंजिल बोले
मैं तो दुश्वार भी  तूने गर आसान किया है मुझको।


आसिफ ग़ाज़ीपुरी-
जी के देखो ये जिन्दगी क्या है।
हाथ कंगन को आरसी क्या है।
मंजिलें इश्क़ ढूढने वालों
यो ही भटका करो अभी क्या है।


अजय कुमार-
ईश्वर के चरण में  ना मिले मुझे
पर पिता आपका साया हो
मन में सेवा का भाव रहे
प्रभु ऐसा प्रेम समाया हो।


वाकिफ़ अंसारी-
ये समुन्दर भी कामयाब नहीं
एक तिनका जो ग़र्क-आब नहीं।
दिल को दिल से अगर मिला दिया जाये
इसे बढ़कर कोई सवाब नहीं।

खुर्शीद हसन-
कहता ये खुर्शीद हसन थे बडे़ मेहंदी हसन
ग़ज़लों के कह के अलविदा यूं चल बसे मेहंदी हसन।






नित्यानंद राय-
मचलो न तब तक तुम
बोतल में मय खुद न डोले
मयपान तुम्हें कराने को
खुद न अपना ढक्कन खोले।


डाॅ. नईम साहिल-
आ गया रास ज़माने को जब अंदाज़ मेरा
आइना भी हुनरे-शीशागरी मांगे है।
जान जाओगे तो हैरानी तुम्हें भी होगी
कौन किस-किस से यहां तश्नालबी मांगे है।




सद्रे मुहतरम डा. इनआम हनफी ने अपनी शायरी से छाप छोड़ी-
इसी उम्मीद पे चलते रहेंगे दीवाने
अंधेरी रात के दामन में एक सेवरा है।



अंत में वीनस केसरी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

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